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गूगल दुनिया की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी है, बावदूज इसके इसकी कंपनी का अपना होमपेज एकदम खाली रहता है. क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? कंपनी चाहे तो इस पेज पर विज्ञापन दिखाकर कई हजार करोड़ रुपये प्रतिदिन कमा सकती है. मगर कंपनी ऐसा क्यों नहीं करती? आज हम आपको इसकी हकीकत बताते हैं. यकीन से कह सकते हैं कि आप पूरी कहानी जानकर दंग रह जाएंगे.
जब तक चैटजीपीटी जैसे एआई टूल नहीं आए थे, तब तक इंसान इंटरनेट पर अगर किसी चीज का सबसे ज्यादा उपयोग करता था तो वह था गूगल का सर्च इंजन. कई लोगों की तो आदत में ही शुमार हो गया था कि पहले गूगल को सर्च करो और फिर गूगल का होमपेज खोलो. होमपेज खोलते ही सबसे पहले गूगल का एक साफ-सुथरा और खाली होमपेज दिखता है. बीच में एक रंगीन लोगो और नीचे एक छोटा-सा सर्च बॉक्स (Search Box). दूसरी कोई चीज नहीं, न ही कोई विज्ञापन. जिस पेज पर दुनिया के अरबों लोग हर रोज विजिट करते हैं, उसे गूगल ने खाली क्यों छोड़ रखा है? इसी ‘खाली जगह’ के पीछे अरबों डॉलर का खेल छिपा है.
शुरुआत बड़ी दिलचस्प है. 1998 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दो छात्र, लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन, Google नाम का एक सर्च इंजन बना रहे थे. उस समय होमपेज को खाली रखने की वजह कोई सोची-समझी रणनीति नहीं, बल्कि एक मजबूरी थी. असल में उन दोनों को उस वक्त HTML कोडिंग ठीक से आती ही नहीं थी. उन्होंने बस एक सिंपल सर्च बॉक्स बनाया और काम शुरू कर दिया. लेकिन जब उन्होंने देखा कि लोगों को यह साफ-सुथरा डिजाइन बहुत पसंद आ रहा है, तो यह मजबूरी धीरे-धीरे दुनिया की सबसे बड़ी बिजनेस स्ट्रैटेजी बन गई.
गूगल ने उस दौर में याहू (Yahoo!) और एमएसएन (MSN) जैसे दिग्गजों के बिल्कुल उलट रास्ता चुना. जहां दूसरे पोर्टल्स अपने होमपेज पर खबरें, शॉपिंग और विज्ञापनों की भीड़ लगा देते थे, वहीं गूगल ने स्पीड को अपनी पहचान बनाया. गूगल के होमपेज का साइज आज भी मात्र 14 KB के आसपास है, जो पलक झपकते ही 1 सेकेंड से भी कम समय में खुल जाता है. उसी समय याहू का पेज 200 से 500 KB का था, जिसे खुलने में 3-8 सेकेंड लग जाते थे. उस जमाने में जब इंटरनेट बहुत धीमा होता था, तब गूगल की यह रफ्तार बहुत मायने रखती थी और लोग इसे पसंद करते थे. आज 5G के दौर में भी यह स्पीड गूगल का एक ‘साइलेंट ब्रांड प्रॉमिस’ बनी हुई है. (Image – Canva)
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1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में इंटरनेट यूजर विज्ञापनों से भरे पेज देख-देखकर थक चुके थे. पॉप-अप, बैनर, फ्लैश एड यूजर एक्सपीरिएंस खराब कर रहे थे. तब गूगल ने जो किया, वो एकदम से हिट हो गया. अपने खाली और साफ-सुथरे पेज से गूगल को एक बहुत ही स्पष्ट संदेश देने में मदद की कि “हम एक सर्च इंजन हैं, न कि कोई मनोरंजन पोर्टल.” गूगल ने अपना ध्यान बेचने के बजाय लोगों की मदद करने पर फोकस किया. जब यूजर्स ने देखा कि यह कंपनी उन्हें फालतू के पॉप-अप्स या विज्ञापनों से परेशान नहीं करती, तो उनका भरोसा गूगल पर बढ़ता गया. इसी भरोसे की वजह से आज ‘गूगल करना’ एक मुहावरा बन चुका है. यह यूजर लॉयल्टी किसी भी विज्ञापन से कहीं ज्यादा कीमती साबित हुई. आपको ये जानकर भी हैरानी होगी कि गूगल की होमपेज पर नो एड की पॉलिसी को अब याहू ने भी अडॉप्ट कर लिया है. उसका सर्च होमपेज भी अब बिना किसी विज्ञापन के आता है. (Image – Canva)
गूगल का एक मास्टरस्ट्रोक यह था कि गूगल ने समझा कि असली पैसा होमपेज पर नहीं, बल्कि सर्च रिजल्ट्स में है. होमपेज पर आने वाला हर इंसान कुछ खरीदने नहीं आता, लेकिन जो व्यक्ति ‘best smartphone under 20000’ सर्च कर रहा है, वह एक संभावित खरीदार है. विज्ञापनदाता ऐसे व्यक्ति को अपना प्रोडक्ट दिखाने के लिए बहुत ज्यादा पैसा देने को तैयार रहते हैं. गूगल ने होमपेज को साफ रखकर अपनी ब्रांड वैल्यू बढ़ाई और सर्च रिजल्ट्स के जरिए टार्गेटेड विज्ञापनों से अरबों की कमाई शुरू की. (Image – Canva)
अगर हम कैलकुलेशन देखें कि गूगल अपने होमपेज से कितना कमा सकता था, तो आंकड़े होश उड़ा देने वाले हैं. गूगल पर रोज लगभग 850 करोड़ विजिट्स होती हैं. अगर गूगल वहां बैनर विज्ञापन लगाता, तो वह एक दिन में करीब 5,000 करोड़ से 15,000 करोड़ रुपये तक कमा सकता था. सालाना आधार पर यह कमाई लगभग लगभग 20 लाख करोड़ से 50 लाख करोड़ रुपये तक हो सकती थी. लेकिन हकीकत यह है कि अगर वहां विज्ञापन होते, तो शायद इतने लोग गूगल पर आते ही नहीं! (Image – Canva)
गूगल का यह मॉडल एक ‘ट्रोजन हॉर्स’ की तरह काम करता है. आप सादगी देखकर गूगल पर आते हैं, आपका भरोसा बनता है, और जब आप अपनी जरूरत की चीज सर्च करते हैं, तब गूगल आपके बिहेवियर को समझकर एकदम सही विज्ञापन दिखाता है. इसी वजह से 2024 में गूगल का वास्तविक रेवेन्यू लगभग 19.67 लाख करोड़ रुपये रहा. (Image – Canva)