स्पेस में डेटा सेंटर बनाने का यह खतरा तो किसी ने सोचा भी नहीं! साइंटिस्ट ने दे दी वॉर्निंग


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  • एलन मस्क की कंपनियां स्पेस में AI डेटा सेंटर बना रही हैं।
  • वैज्ञानिकों ने चेताया, बढ़ते सैटेलाइट खगोलीय अवलोकन में बाधा बनेंगे।
  • यूरोपीय वेधशाला के अनुसार, टेलीस्कोप 28% अवलोकन क्षमता खो देंगे।
  • समाधान: लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट संख्या 1 लाख तक सीमित हो।

Space Data Center Risk: फास्टर कनेक्टिविटी के लिए पहले से ही स्पेस में सैटेलाइट भेजे जा रहे हैं. एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक अब तक हजारों ऐसे सैटेलाइट भेज चुकी है. अब एआई रेस तेज होने के कारण कंपनियां स्पेस में डेटा सेंटर बनाने की तैयारी कर रही हैं. हाल ही सामने आया था कि मस्क की कंपनी स्पेसएक्स स्पेस में 10 लाख एआई सैटेलाइट भेजना चाहती है. गूगल और एनवीडिया भी इसी तरह की तैयारियों में जुटी हुई हैं. अब साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर वॉर्निंग जारी की है. उनका कहना है कि स्पेस में सैटेलाइट की लगातार बढ़ती संख्या से दुनियाभर के टेलीस्कोप से ऑब्जर्वेशन मुश्किल हो जाएगी. यानी धरती पर लगे तगड़े से तगड़े टेलीस्कोप भी अंतरिक्ष में हो रहीं गतिविधियों को नहीं देख पाएंगे. 

बढ़ते सैटेलाइट से जताया जा रहा यह डर

European Southern Observatory (ESO) का कहना है कि पिछले कुछ सालों में सैटेलाइट की संख्या तेजी से बढ़ी है. अकेले स्टारलिंक के 10,400 सैटेलाइट धरती के चक्कर लगा रहे हैं. 2022 से पहले तक स्पेस में मौजूद कुल सैटेलाइट की संख्या ही 14,450 थी. अब कंपनियां और भी ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करने की प्लानिंग में है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बड़ी मुश्किल की शुरुआत भर है. इसका असर समझाते हुए ESO के रिसर्चर ने कहा कि यही हाल रहा तो चिली मे लगा यूरोप का Very Large Telescope (VLT) अपने फील्ड ऑफ व्यू का 28 प्रतिशत खो देगा. यानी यह पहले की तुलना में 28 प्रतिशत कम ऑब्जर्वेशन कर पाएगा. यह तब होगा, जब भविष्य में लॉन्च होने वाले सैटेलाइट धरती से नजर न आएं. अगर इन्हें ब्राइट कर दिया जाता है तो इसका असर और ज्यादा हो सकता है.

इसका समाधान क्या है?

यह बात गौर करने वाली है कि ESO इस समस्या के समाधान के लिए सैटेलाइट की लॉन्चिंग पर रोक लगाने की बात नहीं कह रहा है. इसका कहना है कि लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में एक लाख सैटेलाइट की लिमिट सेट कर दी जानी चाहिए. इससे ग्लोबल कनेक्टिविटी और एस्ट्रॉनोमी के बीच बैलेंस बना रहेगा. रिसर्चर का यह भी कहना है कि सैटेलाइट की ब्राइटनेस से भी काफी असर पड़ता है. ब्राइट सैटेलाइट से ज्यादा रोशनी आती है और इससे टेलीस्कोप से ली गई तस्वीरों पर ज्यादा असर पड़ता है.

स्पेस में एआई डेटा सेंटर क्यों बनाना चाह रही हैं कंपनियां?

एआई आने के बाद डेटा सेंटर की डिमांड बढ़ गई है, लेकिन कंपनियों को नए डेटा सेंटर बनाने के लिए कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. डेटा सेंटर के लिए जगह, पानी और एनर्जी की जरूरत होती है. ये सभी जरूरतें एक ही जगह पूरी होना मुश्किल है और अगर हो भी जाए तो कंपनियों को काफी विरोध झेलना पड़ता है. इसे देखते हुए अब डेटा सेंटर के लिए स्पेस की तरफ देखा जा रहा है.

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