भारत में पिछले कुछ सालों में बॉयलर फटने की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं. बॉयलर एक एक बड़ी मशीन होती है, जिसमें पानी उबालकर भाप बनाई जाती है. सक्ती के इस हादसे के अलावा अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो जनवरी 2026 में रियल इस्पात प्लांट (Real Ispat Plant) बलौदा बाजार में भी 7 मजदूरों की मौत हुई थी. उससे पहले लुधियाना के वेरका मिल्क प्लांट (Verka Milk Plant) और महाराष्ट्र की अमुदान केमिकल्स (Amudan Chemicals) जैसी जगहों पर भी ऐसे ही धमाके हुए थे. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ये हादसे कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कुछ बड़ी वजहें होती हैं-
बॉयलर फटने के कारण
पहला कारण: पानी की कमी
बॉयलर फटने का सबसे बड़ा और पहला कारण है पानी का कम होना और मशीन का हद से ज्यादा गर्म हो जाना. आप इसे एक घरेलू प्रेशर कुकर की तरह समझ सकते हैं. अगर कुकर में पानी खत्म हो जाए, तो वह लाल होकर जलने लगता है और फट सकता है. बॉयलर के अंदर बहुत सारी लोहे की नलियां (ट्यूब) होती हैं. जब पानी का स्तर नीचे गिर जाता है, तो ये नलियां इतनी गर्म हो जाती हैं कि लोहा नरम पड़ने लगता है और तेज दबाव के कारण फट जाता है. अक्सर सेंसर या ऑटोमेटिक सिस्टम खराब होने की वजह से ऑपरेटर को पता ही नहीं चलता कि पानी कम हो गया है. हाल ही में केरल और देश की कई अन्य फैक्ट्रियों में हुए हादसों की शुरुआती जांच में यही पाया गया कि वहां पानी का लेवल बहुत कम हो गया था.
दूसरा कारण: जरूरत से ज्यादा दबाव
दूसरा मुख्य कारण है जरूरत से ज्यादा दबाव (Overpressure) बन जाना. हर बॉयलर की अपनी एक क्षमता होती है कि वह कितना दबाव झेल सकता है. इसके लिए उसमें ‘सेफ्टी वाल्व’ लगाए जाते हैं, जो दबाव बढ़ने पर भाप को बाहर निकाल देते हैं (जैसे कुकर की सीटी). लेकिन अगर ये वाल्व खराब हो जाएं या जाम हो जाएं, तो अंदर इतनी ज्यादा भाप भर जाती है कि बॉयलर बम की तरह फट जाता है. सक्ती के वेदांता प्लांट जैसे हादसों में अक्सर यही देखा गया है कि ट्यूब में अचानक दबाव बढ़ा और वहां से गर्म भाप का जानलेवा रिसाव शुरू हो गया.
तीसरा कारण: मेंटेनेंस न होना
बॉयलर की सही समय पर सफाई न करना और उसमें जंग लगना भी एक बड़ी लापरवाही है. अगर बॉयलर में गंदा या बिना साफ किया हुआ पानी (Untreated Water) इस्तेमाल किया जाए, तो नलियों में गंदगी जम जाती है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे शरीर की नसों में कचरा जम जाना. इससे नलियां अंदर से कमजोर हो जाती हैं और घिसने लगती हैं. पुरानी मशीनों को बिना रिपेयर किए चलाते रहना मौत को दावत देने जैसा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि “ट्रीट किए बिना पानी डालना बॉयलर का सबसे बड़ा दुश्मन है.”
चौथा कारण: काम करने वालों की गलती
एक और गंभीर समस्या है काम करने वालों की गलती और ट्रेनिंग की कमी. कई बार कंपनियां पैसे बचाने के चक्कर में बिना लाइसेंस वाले या अनाड़ी लोगों से बॉयलर चलवाती हैं. इन लोगों को यह नहीं पता होता कि खतरा होने पर कौन सा बटन दबाना है या वार्निंग सिग्नल का क्या मतलब है. जांच रिपोर्टों में अक्सर ऑपरेटर एरर (Operator Error) की बात सामने आती है, जिसका मतलब है कि वहां मौजूद व्यक्ति सही समय पर सही फैसला नहीं ले पाया. मेंटेनेंस के दौरान छोटी सी चूक भी पूरे प्लांट को उड़ा सकती है.
पांचवां कारण: मशीन का खराब डिजाइन
मशीन का डिजाइन खराब होना या घटिया सामान का इस्तेमाल भी एक कारण है. कुछ मालिक मुनाफा कमाने के लिए सस्ते और खराब क्वालिटी के लोहे या पुर्जों का इस्तेमाल करते हैं. अगर सेफ्टी वाल्व या गेज (दबाव नापने वाला मीटर) ही घटिया होगा, तो वह खतरे के समय काम नहीं करेगा. पुरानी तकनीक वाले बॉयलरों में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते, जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है.
छठा कारण: मैनेजमेंट और सिस्टम की कमियां
एक बड़ी समस्या मैनेजमेंट और सिस्टम की कमियां भी हैं. कंपनियां खर्चा कम करने के नाम पर अनुभवी कर्मचारियों को हटाकर ठेके के मजदूरों (Contract Workers) को काम पर रख लेती हैं, जिन्हें काम की पूरी जानकारी नहीं होती. इसके अलावा, सरकारी नियमों की अनदेखी करना, समय पर जांच (Inspection) न करवाना और भ्रष्टाचार भी इन हादसों की जड़ है. नेवेली (NLC) जैसे बड़े प्लांट में दो-दो बार हुए हादसों ने यह साबित किया कि शटडाउन और स्टार्टअप (मशीन बंद करने और शुरू करने) के समय बरती गई जरा-सी भी लापरवाही और राख (Ash) का जमाव कितना खतरनाक हो सकता है.
इस हादसे के बाद क्या?
इस हादसे ने एक बार फिर औद्योगिक सुरक्षा यानी इंडस्ट्रियल सेफ्टी (Industrial Safety) पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. सक्ती के इस वेदांता प्लांट में हुई मौतों के बाद अब मजदूरों की सुरक्षा और प्लांट के मेंटेनेंस की गहराई से जांच की जाएगी. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कंपनियां सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देंगी और सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज करेंगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे.
आने वाले दिनों में सरकार पावर प्लांट और केमिकल फैक्टरियों के लिए नए और सख्त नियम ला सकती है. भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अब आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों जैसे ऑटोमैटिक शट-ऑफ (Automatic Shut-off) और सेंसर तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना जरूरी हो गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई से ही दूसरी कंपनियों को यह कड़ा संदेश जाएगा कि मजदूरों की जान की कीमत किसी भी मुनाफे से बढ़कर है.