नवाबगंज और कुसुंभी, उन्नाव में दो ऐसे मंदिर हैं जो अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनकी प्रतिमाएं, परिसर और पूजा स्थल लगभग समान हैं। ऐसा लगता है जैसे एक ही मंदिर में दर्शन के लिए दोबारा आए हों। माना जाता है कि ये दोनों देवियां जुड़वा बहनें हैं। इन मंदिरों का इतिहास पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं से जुड़ा हुआ है।
भगवान परशुराम और मां दुर्गा मंदिर
कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि का आश्रम भितरेपार गांव (नवाबगंज के पास) में था। उनके पास एक कामधेनु गाय थी, जिसे उस समय के राजा ने मांग लिया। ऋषि ने मना किया तो राजा के पुत्रों ने क्रोधित होकर उनका वध कर दिया।
जब परशुराम को पिता के निधन की सूचना मिली, तो उन्होंने भितरेपार आए और सबसे पहले मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की। इसके बाद उन्होंने अपने प्रण के अनुसार उस वंश का संहार किया। तब से यह मंदिर नवाबगंज में स्थित है।
यह मंदिर नवाबगंज हाईवे से केवल 150–200 मीटर की दूरी पर स्थित है और श्रद्धालु मानते हैं कि यहां मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं।
कुशहरी देवी मंदिर – देश का एकमात्र मंदिर
मां दुर्गा मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर कुसुंभी में स्थित है कुशहरी देवी मंदिर। कहा जाता है कि इसकी स्थापना भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने की थी। यही कारण है कि इसे “कुशहरी देवी” कहा जाता है।
यहां की विशेषता यह है कि मंदिर में एक ही छत्रधारी घोड़े पर सवार लव-कुश की मूर्ति स्थापित है, जो इसे पूरे भारत में अद्वितीय बनाती है। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्थल घोषित किया है।
कुशहरी माता की प्रतिमा का प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब माता सीता को वन में प्यास लगी, तो लक्ष्मण जल लाने गए। कई प्रयासों के बाद उन्हें कुएं में देवी की प्रतिमा दिखाई दी। इसे बाहर निकालकर बरगद के पेड़ के नीचे रखा गया। इसके बाद माता सीता ने इसे अपने साथ ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रखा।
समय के साथ, जब लव और कुश बड़े हुए, तो माता सीता ने उनकी मदद से इस प्रतिमा की स्थापना करवाई और पूजा-अर्चना शुरू की।
मंदिर परिसर और सरोवर
कुशहरी देवी मंदिर के परिसर में एक सुंदर सरोवर भी स्थित है। इसे गऊ घाट झील से जोड़ा गया है। श्रद्धालु मंदिर दर्शन के साथ इस सरोवर के पवित्र जल का भी दर्शन करते हैं।
जुड़वा मंदिरों की अनोखी समानता
नवाबगंज में मां दुर्गा और कुसुंभी में कुशहरी देवी मंदिर दूरी में ही स्थित हैं और इनकी प्रतिमाएं, मंदिर परिसर और पूजा स्थल लगभग समान हैं। दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को ऐसा लगता है जैसे वे एक ही मंदिर में दोबारा आए हों। यही कारण है कि इन्हें जुड़वा बहनें माना जाता है।