घर के LPG Cylinder में 14.2 किलो गैस ही क्यों होती है? जानिए असली वजह

क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि घर में इस्तेमाल होने वाले रसोई LPG Cylinder में हमेशा 14.2 किलो गैस ही क्यों भरी होती है? यह कोई सीधा-सादा नंबर जैसे 14 किलो या 15 किलो क्यों नहीं होता? पहली बार देखने पर यह नंबर थोड़ा अजीब जरूर लगता है, लेकिन यकीन मानिए इसके पीछे दशकों पुरानी एक बहुत ही सूझबूझ भरी प्लानिंग है, जिसे हमारे फायदे के लिए बनाया गया था.

असल में, 14.2 किलो का यह वजन कोई ऐसी मजबूरी नहीं थी जिसे बदला न जा सके. यह फैसला बहुत सोच-समझकर लिया गया था, ताकि आम आदमी के लिए सिलेंडर का इस्तेमाल करना आसान हो, जेब पर भारी न पड़े और सुरक्षा भी पूरी रहे. वक्त के साथ यह मात्रा इतनी सटीक बैठी कि इसे ही पक्का स्टैंडर्ड मान लिया गया और आज भी हम इसी का पालन कर रहे हैं. (Image – REUTERS)

भारत में घरेलू LPG का चलन 1950 के दशक के आखिरी सालों में शुरू हुआ था. उस दौर में बर्मा शेल (Burmah Shell) नाम की एक विदेशी कंपनी गैस सप्लाई करती थी. इसी कंपनी ने सबसे पहले सिलेंडर का यह खास आकार और वजन तय किया था. बाद में यही कंपनी बदलकर भारत पेट्रोलियम (BPCL) बनी, लेकिन जो सिलेंडर का साइज उन्होंने तब तय किया था, वह आज भी वैसा का वैसा ही चल रहा है.

बर्मा शेल कंपनी ने उस जमाने में तीन बड़ी बातों को ध्यान में रखकर यह 14.2 किलो का जादुई नंबर चुना था. सबसे पहली और जरूरी बात थी- उठाने और ले जाने में आसानी. जब सिलेंडर में 14.2 किलो गैस भरी होती है, तो खाली लोहे की टंकी को मिलाकर इसका कुल वजन करीब 29 से 30 किलो के आसपास पहुंच जाता है. उस समय के सर्वे के हिसाब से एक औसत भारतीय व्यक्ति इतना वजन आसानी से उठाकर यहां-वहां रख सकता था. अगर वजन 30 किलो से ज्यादा होता, तो सिलेंडर का मूवमेंट थोड़ा मुश्किल हो जाता.

दूसरी बड़ी वजह थी- एक परिवार की जरूरत का अंदाजा. उस समय एक्सपर्ट्स ने यह हिसाब लगाया कि एक मध्यमवर्गीय परिवार में महीनेभर का खाना बनाने के लिए कितनी गैस खर्च होगी. रिसर्च में यह पाया गया कि 14 किलो के आसपास गैस एक सामान्य परिवार के लिए करीब 30 से 45 दिनों तक बड़े आराम से चल जाती है. यानी एक बार सिलेंडर आ गया तो महीने भर की फुर्सत.

इस हिसाब से ग्राहकों के लिए भी आसानी हो गई कि उन्हें हर महीने या डेढ़ महीने में ही नया सिलेंडर बुक करना पड़ता था. साथ ही, गैस कंपनियों के लिए भी डिलीवरी का काम आसान हो गया, क्योंकि उन्हें पता था कि किस घर में कितने दिन बाद सिलेंडर की जरूरत पड़ेगी. यह सप्लाई का तरीका इतना कामयाब रहा कि यह मॉडल आज कई दशकों बाद भी पूरी तरह फिट बैठता है.

तीसरा और सबसे जरूरी तकनीकी कारण था. यह सुरक्षा और सिलेंडर की मजबूती से जुड़ा था. हम जानते हैं कि LPG सिलेंडर के अंदर गैस को बहुत तेज दबाव (Pressure) के साथ भरा जाता है. गैस के इस दबाव को झेलने के लिए लोहे की टंकी की दीवारें एक खास मोटाई की बनाई जाती हैं. अगर इसमें 14.2 किलो से ज्यादा गैस भरने की कोशिश की जाती, तो सिलेंडर फटने का डर बढ़ जाता या फिर उसे बहुत ज्यादा मोटा और भारी बनाना पड़ता.

अगर सिलेंडर को और ज्यादा मजबूत और भारी बनाया जाता, तो उसे बनाने का खर्च (Cost) बढ़ जाता और उसे घर तक पहुंचाना भी बहुत मुश्किल हो जाता. उस समय की इंजीनियरिंग और तकनीक के हिसाब से 14.2 किलो ही वह सबसे सुरक्षित और सही मात्रा थी, जिसे आसानी से मैनेज किया जा सकता था. इसमें सुरक्षा और बचत का एकदम सही बैलेंस था.

अब थोड़ा और गहराई से समझें तो LPG कोई एक अकेली गैस नहीं है. यह असल में दो गैसों प्रोपेन (Propane) और ब्यूटेन (Butane) का मिश्रण है. इन दोनों ही गैसों का वजन और घनत्व (Density) अलग-अलग होता है. मौसम के हिसाब से इनका अनुपात भी थोड़ा-बहुत बदलता रहता है, ताकि गैस का प्रेशर सही बना रहे.

जब उस दौर के इंजीनियरों ने सिलेंडर के अंदर की खाली जगह, गैस के फैलने की क्षमता और दबाव सहने की ताकत को ध्यान में रखकर कैलकुलेशन की, तो जो सबसे सटीक और सुरक्षित नंबर निकलकर सामने आया, वह 14.2 किलो ही था. तो अब आप समझ गए होंगे कि यह नंबर सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि यह सालों की इंजीनियरिंग, गणित और हमारी सहूलियत के लिए जरूरी था.