- भारत सोलर एनर्जी उत्पादन में तीसरा सबसे बड़ा देश बना।
- स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 136 गीगावाट तक पहुंच चुकी है।
- सोलर पैनल सूर्य की किरणों को इलेक्ट्रिक ऊर्जा में बदलते हैं।
- सोलर पैनल के तीन मुख्य प्रकार: मोनो, पॉली और थिन-फिल्म।
Solar Energy Technology: भारत में सोलर एनर्जी का तेजी से विस्तार हो रहा है और पिछले कुछ ही सालों में भारत सोलर एनर्जी का तीसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर बन गया. अब बड़े शहरों से लेकर गांवों तक हर जगह सोलर पैनल नजर आना आम हो गया है. ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता अब लगभग 136 गीगावाट तक पहुंच गई है और इसमें लगातार बढ़ोतरी भी जारी है. इन सबके बीच यह समझना जरूरी है कि सूरज के किरणों से बिजली बनती कैसे है. आज हम जानेंगे कि सोलर एनर्जी से बिजली कैसे बनती है और इसमें सोलर पैनल का क्या यूज है.
सूरज की किरणों से कैसे बनती है बिजली?
Solar Energy Technology सूरज से आने वाले किरणों को इलेक्ट्रिक एनर्जी में बदल देती है. ऐसा photovoltaic (PV) पैनल या मिरर के जरिए किया जा सकता है, जो सोलर रेडिएशंस को कन्सन्ट्रेट कर देते हैं. इस एनर्जी को बिजली जनरेट करने के लिए यूज किया जा सकता है और ये बैटरी में भी स्टोर हो सकती है. सूरज से आने वाली किरणों को कैप्चर करने के लिए सोलर पैनल यूज होते हैं.
धूप से बिजली बनाने में सोलर पैनल का क्या यूज?
सूरज की किरणों से बिजली बनाने में सोलर पैनल यूज होते हैं. सोलर पैनल में सिलिकॉन सेल्स, मेटल फ्रेम और ग्लास की केसिंग होती है, जिसमें स्पेशल फिल्म और वायरिंग लगी होती है. मैक्सिमम इलेक्ट्रिसिटी प्रोडक्शन के लिए इन्हें सूरज के सामने एक खास फॉर्मेट में सेट किया जाता है. इसमें लगी सेल्स को photovoltaic cells भी कहा जाता है. ये सेल्स सनलाइट को सोख लेती हैं. फिर इस लाइट एनर्जी को इलेक्ट्रिक करंट में बदला जाता है. सारी सेल्स से इकट्ठा इलेक्ट्रिक करंट से इलेक्ट्रिसिटी जनरेट की जाती है.
कितनी तरह के होते हैं सोलर पैनल?
सोलर पैनल मुख्य तौर पर तीन तरह के होते हैं- मोनोक्रिस्टलाइन, पॉलीक्रिस्टलाइन और थिन फिल्म. इन सभी के काम करने का तरीका एक जैसा होता है, लेकिन बनावट, परफॉर्मेंस और कीमत के आधार पर इनमें अंतर होता है. थिन फिल्म की बात करें तो ये हल्के और फ्लेक्सिबल पैनल होते हैं और इनकी कीमत भी कम होती है. ये कम लोड और पोर्टेबल जरूरतों को पूरा करने के लिए सही च्वॉइस है.
अगर बाकी दो की बात करें तो मोनोक्रिस्टलाइन और पॉलीक्रिस्टलाइन में मुख्य अंतर सेल्स का होता है. मोनोक्रिस्टलाइन पैनल में सिलिकॉन के सिंगल क्रिस्टल से बनी सोलर सेल्स यूज होती हैं. ब्लैक दिखने वाले इन पैनल की एफिशिएंसी सबसे ज्यादा होती है और इनकी कीमत भी बाकियों से ज्यादा होती है. वहीं पॉलीक्रिस्टलाइन की बात करें तो इसमें सिलिकॉन के कई मेल्टेड फ्रेगमेंट से बनी सोलर सेल्स यूज होती हैं और ये दिखने में ब्लू होते हैं. ये थोड़े सस्ते होते हैं, जिसके चलते इन्हें रेजीडेंशियल और कमर्शियल प्रोजेक्ट में यूज किया जाता है.
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