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डिजिटल पेमेंट और टिकटिंग के दौर में क्यूआर कोड का इस्तेमाल हर जगह हो रहा है. इसके तीन कोनों पर बने बड़े चौकोर डिब्बे कोई आम डिजाइन नहीं बल्कि फाइंडर पैटर्न्स कहलाते हैं. ये डिब्बे स्कैनर को कोड की सही स्थिति और दिशा की तुरंत पहचान करने में मदद करते हैं. फोन टेढ़ा या उल्टा पकड़ने पर भी स्कैनर कोड को आसानी से पहचानकर सेकंड के सौवें हिस्से में प्रोसेस कर लेता है.
इन्हें आप क्यूआर कोड की आंखें मान सकते हैं.
नई दिल्ली. जब भी आप किसी दुकान पर चाय का पेमेंट करते हैं, मेट्रो का टिकट बुक करते हैं या कोई वेबसाइट खोलते हैं, तो क्यूआर कोड ज़रूर स्कैन करते होंगे. रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली इस तकनीक को हम सब इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन इसके बारीक डिज़ाइन पर ध्यान बहुत कम लोगों का जाता है. अगर आप ध्यान से देखें तो लगभग हर क्यूआर कोड के तीन कोनों पर चौकोर डिब्बे बने होते हैं, जबकि चौथा कोना हमेशा खाली रहता है. कई लोगों को लगता है कि यह सिर्फ कोई डिज़ाइन या पैटर्न है, लेकिन असल में इसके पीछे बेहद स्मार्ट तकनीक काम करती है जो आपके पेमेंट को पलक झपकते ही पूरा कर देती है.
तकनीकी भाषा में इन तीन बड़े स्क्वेयर्स को फाइंडर पैटर्न्स या पोजीशन डिटैक्शन पैटर्न्स कहा जाता है. इन्हें आप क्यूआर कोड की आँखें मान सकते हैं. जब आप अपने मोबाइल का कैमरा क्यूआर कोड के सामने लाते हैं, तो ये तीनों डिब्बे ही सबसे पहले कैमरे के सॉफ्टवेयर को यह बताते हैं कि यहां एक कोड मौजूद है. इससे कैमरा बाकी बैकग्राउंड को छोड़कर सीधे डेटा पर फोकस कर लेता है.
फोन उल्टा पकड़ो या टेढ़ा, स्कैन सेकंड में होगा
जब आप स्कैन करते हैं, तो जरूरी नहीं कि आपका फोन बिल्कुल सीधा हो. आप फोन को उल्टा, टेढ़ा या किसी भी एंगल पर पकड़ सकते हैं. ये तीनों डिब्बे स्कैनर को यह समझने में मदद करते हैं कि कोड किस दिशा में मुड़ा हुआ है. स्कैनर इन तीन डिब्बों को देखते ही इमेज को अंदर ही अंदर सीधा करके पहचान लेता है. इसी वजह से आपका स्कैनिंग प्रोसेस सिर्फ 0.1 सेकंड में हो जाता है.
चौथा कोना खाली क्यों रहता है?
अगर चारों कोनों पर बड़े डिब्बे बना दिए जाएं, तो आपका फोन यह पहचान ही नहीं पाएगा कि कोड का ऊपर का हिस्सा कौन सा है और नीचे का कौन सा. गणित के हिसाब से किसी भी चौकोर चीज़ की दिशा तय करने के लिए 3 पॉइंट ही काफी होते हैं. चौथे कोने में डिब्बा न होने के कारण ही स्कैनर समझ पाता है कि कोड सीधा रखा है या उल्टा.
एक छोटी सी काम की बात
क्यूआर कोड का आविष्कार साल 1994 में जापान की डेंसो वेव नाम की कंपनी ने किया था. शुरुआत में इसका इस्तेमाल कारों के पार्ट्स की गिनती और पहचान रखने के लिए किया जाता था, लेकिन आज यह हमारी डिजिटल लाइफ का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है.
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मैं जय ठाकुर, न्यूज18 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं. मेरा मुख्य काम बिजनेस की पेचीदा खबरों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाना है. फिर चाहे वह शेयर बाजार की हलचल हो, देश की इकोनॉमी क…
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