कितनी धूप में सबसे ज्यादा बिजली बनाते हैं सोलर पैनल? जानें हिसाब


सोलर पैनल को कितनी डायरेक्ट और कितने घंटे सनलाइट मिल रही है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दुनिया के किस कोने में रहते हैं. इसके अलावा पैनल के एंगल, टिल्ट और मौसम जैसे फैक्टर्स का भी इस पर असर होता है. यही वजह है कि राजस्थान में लगा सोलर एनर्जी सिस्टम केरल में लगे समान सिस्टम के मुकाबले ज्यादा एनर्जी जनरेट करेगा. मैक्सिमम एनर्जी जनरेशन के लिए पैनल को ज्यादा से ज्यादा घंटे सीधी धूप में रहना बहुत जरूरी होता है.

सोलर पैनल को कितनी डायरेक्ट और कितने घंटे सनलाइट मिल रही है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दुनिया के किस कोने में रहते हैं. इसके अलावा पैनल के एंगल, टिल्ट और मौसम जैसे फैक्टर्स का भी इस पर असर होता है. यही वजह है कि राजस्थान में लगा सोलर एनर्जी सिस्टम केरल में लगे समान सिस्टम के मुकाबले ज्यादा एनर्जी जनरेट करेगा. मैक्सिमम एनर्जी जनरेशन के लिए पैनल को ज्यादा से ज्यादा घंटे सीधी धूप में रहना बहुत जरूरी होता है.

जब सनलाइट की बात आती है तो ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सूरज निकलने से लेकर छिपने तक रहने वाली सनलाइट को काउंट किया जाता है. असल में सोलर पैनल के मामले में ऐसा नहीं होता. मैक्सिमम इनपुट के लिए सोलर पैनल को कड़ी और तेज धूप की जरूरत होती है. अगर पीक सन आवर की बात करें तो इसका मतलब उस एक घंटे से है, जब धूप सबसे तेज होती है और इसकी इंटेंसिटी 1,000 वॉट प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच जाती है. इस दौरान सोलर पैनल सबसे ज्यादा बिजली बनाते हैं.

जब सनलाइट की बात आती है तो ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सूरज निकलने से लेकर छिपने तक रहने वाली सनलाइट को काउंट किया जाता है. असल में सोलर पैनल के मामले में ऐसा नहीं होता. मैक्सिमम इनपुट के लिए सोलर पैनल को कड़ी और तेज धूप की जरूरत होती है. अगर पीक सन आवर की बात करें तो इसका मतलब उस एक घंटे से है, जब धूप सबसे तेज होती है और इसकी इंटेंसिटी 1,000 वॉट प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच जाती है. इस दौरान सोलर पैनल सबसे ज्यादा बिजली बनाते हैं.

पीक सन आवर्स से ही यह तय होता है कि आपके घर की छत पर लगा सोलर सिस्टम कितनी बिजली जनरेट करेगा. पैनल लगाने से पहले आप पीक सन आवर्स से यह पता लगा सकते हैं कि आप जिस सिस्टम को लगाना चाह रहे हैं, वह कितनी बिजली बनाएगा, आपको कितने साइज के पैनल लगाने होंगे और आप जो पैसा खर्च कर रहे हैं, उसका रिटर्न कब तक पूरा हो जाएगा.

पीक सन आवर्स से ही यह तय होता है कि आपके घर की छत पर लगा सोलर सिस्टम कितनी बिजली जनरेट करेगा. पैनल लगाने से पहले आप पीक सन आवर्स से यह पता लगा सकते हैं कि आप जिस सिस्टम को लगाना चाह रहे हैं, वह कितनी बिजली बनाएगा, आपको कितने साइज के पैनल लगाने होंगे और आप जो पैसा खर्च कर रहे हैं, उसका रिटर्न कब तक पूरा हो जाएगा.

पीक सन आवर्स की संख्या दुनिया के अलग-अलग कोनों में अलग-अलग होती है. भारत की बात करें तो राजस्थान में 6-7 घंटे पीक सन आवर्स होते हैं, वहीं यूनाइटेड किंगडम में यह समय केवल 2-3 घंटे का होता है. अमेरिका के कैलिफॉर्निया में धूप ज्यादा रहने के कारण यहां पीक आवर्स 5-6 घंटे और जर्मनी में लगभग 3 घंटे ही होते हैं. कम पीक आवर्स का मतलब है कि पैनल की एनर्जी आउटपुट कम रहने वाली है और आपको जरूरतें पूरा करने के लिए बड़े सिस्टम की जरूरत पड़ेगी.

पीक सन आवर्स की संख्या दुनिया के अलग-अलग कोनों में अलग-अलग होती है. भारत की बात करें तो राजस्थान में 6-7 घंटे पीक सन आवर्स होते हैं, वहीं यूनाइटेड किंगडम में यह समय केवल 2-3 घंटे का होता है. अमेरिका के कैलिफॉर्निया में धूप ज्यादा रहने के कारण यहां पीक आवर्स 5-6 घंटे और जर्मनी में लगभग 3 घंटे ही होते हैं. कम पीक आवर्स का मतलब है कि पैनल की एनर्जी आउटपुट कम रहने वाली है और आपको जरूरतें पूरा करने के लिए बड़े सिस्टम की जरूरत पड़ेगी.

पीक सन आवर्स इस बात पर डिपेंड करते हैं कि आप इक्वेटर से कितना दूर या पास रहते हैं. भारत अफ्रीका, साउथईस्ट एशिया और साउथ अमेरिका के कई देश इक्वेटर के पास हैं, जिसका मतलब है कि वहां ज्यादा तेज और चिलचिलाती धूप होगी. दूसरी तरफ कनाडा, नॉर्दन यूरोप और नॉर्दन एशिया के देश इक्वेटर से दूर हैं, जिस वजह से वहां धूप कम रहती है.

पीक सन आवर्स इस बात पर डिपेंड करते हैं कि आप इक्वेटर से कितना दूर या पास रहते हैं. भारत अफ्रीका, साउथईस्ट एशिया और साउथ अमेरिका के कई देश इक्वेटर के पास हैं, जिसका मतलब है कि वहां ज्यादा तेज और चिलचिलाती धूप होगी. दूसरी तरफ कनाडा, नॉर्दन यूरोप और नॉर्दन एशिया के देश इक्वेटर से दूर हैं, जिस वजह से वहां धूप कम रहती है.

पैनल ऑरिएंटेशन से एनर्जी आउटपुट पर असर पड़ता है. नॉर्दन हेमिस्फेयर वाले देशों में पैनल को साउथ फेसिंग लगाना चाहिए वहीं सदर्न हेमिस्फेयर वाले देशों में पैनल का ओरिएंटेशन नॉर्थ फेसिंग होना चाहिए. इसके अलावा latitude के हिसाब से पैनल का टिल्ट एंगल सेट करना चाहिए. उदाहरण के तौर पर अहमदाबाद में पैनल का टिल्ट 23 डिग्री, जबकि अमेरिका के न्यूयॉर्क में यह 40 डिग्री के करीब होना चाहिए.

पैनल ऑरिएंटेशन से एनर्जी आउटपुट पर असर पड़ता है. नॉर्दन हेमिस्फेयर वाले देशों में पैनल को साउथ फेसिंग लगाना चाहिए वहीं सदर्न हेमिस्फेयर वाले देशों में पैनल का ओरिएंटेशन नॉर्थ फेसिंग होना चाहिए. इसके अलावा latitude के हिसाब से पैनल का टिल्ट एंगल सेट करना चाहिए. उदाहरण के तौर पर अहमदाबाद में पैनल का टिल्ट 23 डिग्री, जबकि अमेरिका के न्यूयॉर्क में यह 40 डिग्री के करीब होना चाहिए.

अगर ओरिएंटेशन और टिल्ट का ध्यान न रखा जाए तो इसके कई नुकसान हैं. खराब टिल्ट से एनर्जी आउटपुट में 10-25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. इसी तरह शेडिंग का रिस्क भी बढ़ जाता है. गलत ओरिएंटेशन और टिल्ट के कारण पैनल पीक आवर्स के दौरान मैक्सिमम एफिशिएंसी तक नहीं पहुंच पाएंगे.

अगर ओरिएंटेशन और टिल्ट का ध्यान न रखा जाए तो इसके कई नुकसान हैं. खराब टिल्ट से एनर्जी आउटपुट में 10-25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. इसी तरह शेडिंग का रिस्क भी बढ़ जाता है. गलत ओरिएंटेशन और टिल्ट के कारण पैनल पीक आवर्स के दौरान मैक्सिमम एफिशिएंसी तक नहीं पहुंच पाएंगे.

Published at : 03 Aug 2026 04:11 PM (IST)

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